Friday, 19 June 2015

गंजापन – दुनियाँ का सबसे बड़ा दुःख

दोस्तों ! दुनियां में बहुत दुःख है ! शायद ही कोई इंसान ऐसा हो इस ब्रह्माण्ड में जो दुखी न हो ! कोई बीवी से दुखी तो कोई पति से कोई बेटे से तो कोई बाप से कोई पैसे ना होने पर दुखी तो कोई बीमारी से ! किन्तु एक दुःख ऐसा है जो सर्वव्यापी होने के साथ साथ ऐसा है की शायद आज तक उस दुःख से बड़ा दुःख कोई बना ही नहीं ! जी हां ! वो दुःख है – गंजापन !

वैसे तो चाहे बच्चा हो या जवान या फिर कोई बुजुर्ग ही क्यों ना हों ! सभी चाहते हैं की उनके घने वा भरपूर बाल हों ! यदि गलती से बाल टूटने शुरू हो जाएँ तो बस ऐसी टेंशन पैदा हो जाती है जैसी बोर्ड के एग्जाम के समय भी नहीं हुई थी ! भाई साहिब ! इस टेंशन को मै केवल उस टेंशन के बराबर समझता हूँ जो शादी के समय होती है !

यदि बाल शादी होने के बाद उड़ने शुरू होते हैं तो मन के एक कोने में फिर भी एक तसल्ली रहती है की चल यार अब क्या फ़र्क पड़ता है ? अब तो शादी हो चुकी है ! उसमे भी तर्क सिर्फ यह है की - अंगूर खट्टे हैं ! क्योंकि बाल टूटने तो रूकने से रहे ! चलो दिल को ही समझा लो ! लेकिन यदि शादी से पहले बाल उड़ने शुरू हो गए तो समझो ! गयी भैंसिया पानी में ! भाई ! रातों की नींद हराम हो जाती है ! दुनिया का कोई तरीका इंसान नहीं छोड़ता की किसी तरह बाल टूटने से रूक जाएँ ! हर प्रकार का तेल लगाया जाता है फिर चाहे किसी के कहने पर सात  समुंदर पार से ही क्यों न लाना पड़े ! बाल आयें या ना आयें किन्तु तेल कपनियों के वारे न्यारे पक्के हैं ! कई नीम हकीम मिल जायेंगे आपको तेल बेचते हुए जिनका खुद का गुलशन उजड़ा हुआ होता है यानि झालर या टकला निकला होता है ! किन्तु फिर भी लोग अपने सर की हरियाली पाने के लिए हर हथकंडा अपनाने को तैयार रहते हैं !

यदि तेल से भी कोई फिर्क नहीं पड़ता तो दूसरों के कहने में आकर घरेलु उपचार किये जाते हैं ! रीठे, आवला, शिकाकाई और ना जाने क्या क्या ! जिन चीजों के नाम कभी सुने ही नहीं थे वह भी इस्तेमाल में लायी जाती हैं ! वो बात अलग है की बाल टूटने बंद होने की जगह और ज्यादा झड़ने लग जाएँ !

अच्छा, गंजो की भी कई किस्में होती हैं !

कई लोग बीच में से थोड़े से गंजे हो जाते हैं ! इस प्रकार के गंजे सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं !

कई लोग बीच में पूरे सफाचट हो जाते हैं  साइड से थोड़े-थोड़े बाल रह जाते हैं ! इन्हें झालर वाले गंजे भी कहा जाता है ! ये बहुत ही कम पाए जाते हैं !

कई लोगों के बिलकुल बाल नहीं होते ! इन्हें शेट्टी या डैनी स्टाइल कहा जाता है ! कई लोग इन्हें गंजे की जगह टकला नाम से बुलाते हैं !

तीनों ही प्रकार के गंजों में दो बात कोमन है एक यह की टोपी का अधिक इस्तेमाल करते हैं ! दूसरा यह की एक जुमला सब के लिए प्रसिद्ध है की बाल उड़ने का मतलब – पैसा आने वाला है वो भी मोटा पैसा ! वो बात अलग है की जेब में चाहे फूटी कोड़ी हो ना हो सेठ तो बन ही गए – बातों के सेठ !

तीनों की अपनी अलग अलग परेशानियाँ भी हैं ! जहाँ झालर वाले बाबु समझ नहीं पाते की कटिंग कब कराएँ ? वहीँ टकले बाबु को नहाते समय समझ ही नहीं आता की साबुन कहाँ तक लगाना है ? और बीच से गंजे बाबू के सर के ठीक बीच में कभी साबुन जम जाता है तो कभी तेल ! कंघी करनी अलग मुश्किल !

मै तो कहता हूँ सभी देश के प्रधानमंत्रियों को मिल बैठकर इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए ! सभी वैज्ञानिकों को केवल और केवल इसी काम पर लगा देना चाहिए ! क्योंकि जब हम अपने सर को हराभरा नहीं रख सकते तो प्रकृति को क्या हराभरा रखेंगे ! यदि जल्द ही इसका समाधान ना निकाला गया तो हर तरफ सिर्फ टकले ही टकले दिखेंगे ! और भविष्य के लोगों को पता ही नहीं चल पायेगा की उनके पूर्वज सर पर खेती किया करते थे !

आप में से कई लोग इसी समस्या से जूझ रहे होंगे ! कुछ सीरियस भी होंगे ! तो ऐसे सभी भाई साहिब से में वादा करता हूँ की उनके लिए प्रार्थना करूँगा की उनका गुलशन फिर से हरा भरा हो जाये !

ऐसा नहीं है की टकला होने का सिर्फ नुक्सान ही होता है कुछ फायदे भी हैं इसके ! कंघी की जरुरत नहीं ! कटिंग का खर्चा नहीं !  ओर तो ओर यदि बेगम से लड़ाई हो जाये तो बाल पकड़कर खींचने का कोई चांस ही नहीं !

और एक सबसे बड़ा लाभ यह की हर टकले की बीवी यही कहती मिलेगी की – इक चाँद आसमां पे, इक मेरे पास !

 

प्रवीन बहल खुशदिल

 

Wednesday, 17 June 2015

करवाचौथ – दिन पत्नियों का ! मौज पतियों की !

करवाचौथ ! पति के लिए अमृत समान एक ऐसा दिन जिस दिन बीवी अपना हथियार यानि बेलन नहीं उठा सकती ! उस दिन का बीवी के साथ साथ पति भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं ! बीवी देवी का रूप हो तो नार्मल दिन है ही ! उस दिन की अहमियत तो उनके लिए स्वर्ग में बिताये एक दिन की तरेह है जिनकी बीवी खतरनाक, खलनायिका, खूंखार, उग्र, चुड़ैल, चाण्डालिनी का रूप लिए रखती हैं ! किन्तु उस दिन सब शांत, नम्र, सावित्री, देवी का रूप लिए होती हैं ! उस दिन आप राजा होते हो और वो आपकी दासी !

करवाचौथ के दिन पत्नी जी भरकर दुआ करती है ! हे प्रभु ! इनकी दीर्घायु की कामना करती हूँ ! पुरे वर्ष ये इसी तरेह मेरे ताने सुनते रहें वा बेलन खाते रहें ! इस गायें रुपी पति को कम से कम मेरे जितनी उम्र तो दे ही दे ! ताकि इसी तरेह कमा कमा कर ये गाय रुपी पति मुझे खिलाता पिलाता रहे और मुझे शोपिंग के पैसे मिलते रहें ! वैसे भी मिलते क्या रहें ? कमाता रहे तो पैसे तो अपने आप ले ही लुंगी ! पर आज नहीं ! आज माफ़ किया !

पति भी आज तक हैरान परेशान हैं की आज के दिन ऐसा हुआ क्या था जो हमें इतनी छूट मिल जाति है ! और उस पर उस दिन व्यंजन अलग से खाने को दे दिए जाते हैं ! पति भी खुश ! चल इतने पैसे खर्च के यदि एक दिन ताने और मार की जगह थोडा दुलार मिल रहा है तो कोन सा महंगा है ? थोडा सजने सवारने और खाने पीने में लगता ही क्या है ?

रूप श्रंघार ऐसा की खुद पति भी पहचान नहीं पाते की बीवी अपनी है या किसी और की ! चूड़ी, बिंदी, सिन्दूर, नयी महंगी साडी, सबकुछ ब्रांडेड व नया ! रात रात भर बैठकर हाथों में मेहँदी लगानी भी जरुरी है ! एक रात पहले का नज़ारा आप देखेंगे तो पायेंगे की किसी और त्यौहार पर रात भर ऐसी चहल पहल नहीं होती ! और चहल-पहल भी ऐसी की हर जगह बीवी मेहँदी की लाइन में लगी दिखाई देंगी और पति बच्चों को सँभालने में !

अचम्भा तो तब होता है जब करवाचौथ के दिन सारी खलनायिकाएं ! मेरा मतलब बीवियां साथ मिलके पूजा करती हैं ! ऐसा लगता है इनसे सीधा, शालीन, सभ्य कोई हो ही नहीं सकता ! हां, किन्तु एक बात तारीफे काबिल है – सारा दिन भूखे रहना ! भेई पानी भी नहीं पीतीं ! फिर सोचता हूँ ! पुरे साल रानी बनकर रहने के एवज में ये कोन सा बड़ा काम है !

हद तो दो-तीन दिन पहले शुरू हो जाती है ! जरा सी बहस हुई नहीं ताना शुरू – फालतू बोलोगे तो बताये देती हूँ व्रत ना रखूंगी ! बेचारा पति – मरे क्या ना करे ! चुपचाप काम पे लग जाता है ! भाई – जरा सा चुप रहके यदि जिंदगी बचती है तो चुप रहने में ही भलाई है !

हां ! यदि बीवी नयी नयी है तो खतरा बहुत ज्यादा होता है ! महारानी जी से कभी कभी भूखा रहा नहीं जाता ! या तो बीच में ही बेहोश या भूख से हाल खराब होने पर कुछ खा ही लिया जाता है ! अब तो पति की हालत खराब ! पता नहीं कितने दिन जिंदा रह पाऊंगा ? यही सोच सोचकर बेचारा पूरा एक हफ्ता बीमार ! किसी तरह ठीक होने पर तसल्ली होती है फिर समझाने और मनाने का दौर शुरू ! माँ भी समझाती है – देख बेटी ! यदि सारी उम्र मौज करना चाहती हो ! पति की छाती पे मूंग दलना चाहती हो अपना राज कायम रखना चाहती हो तो पति की सलामती जरुरी है, उसके लिए व्रत तो रखना ही होगा ! हमने भी झेला है आखिर इतने साल !

मगर आज तक एक बात समझ नहीं आई ? उपरवाले ने ये बंदिश, समझौता, कमिटमेंट सिर्फ हिन्दुस्तानियों के लिए ही क्यों रखा ? विदेशियों के लिए क्यों नहीं ? क्या वहां की बीवियों को पति की लम्बी उम्र नहीं चाहिए ?

खैर, जो भी हो ! अपनी किस्मत तो बहुत बढ़िया रही है ! एकदम झकास ! बीवी इतनी सुशील, और सीधी है बिलकुल गाय के माफिक ! ना ना ना ! किसी ग़लतफ़हमी में ना रहना ! सुशील इसलिए के नाम उसका सुशीला है ! सीधी इसलिए की लम्बी बहुत है ! और गाये इसलिए की जब मै बैल (बहल) हूँ तो वो गाये तो हुई ही अपने आप ! पर है मरखनी गाये !

कुल मिला के यदि आपको जिन्दा रहना हो ! तो बीवी से पंगा लेने की जरा सी कोशिश भी आपके लिए घातक सिद्ध हो सकती है ! इसलिए चुपचाप सबकुछ सहते हुए अपने आपको लल्लू सिद्ध करते हुए जो वो कहे उसे सर आखों पर रखकर उसे पलकों पर बैठा कर रखो ! नहीं तो छोटी लड़ाई पर आपका हुक्का पानी बंद और बड़ी लड़ाई पे आपकी साँसे बंद !

इसलिए सब एक आवाज में बोलेंगे – पतियों की रानी, महारानी, घर की सिकंदर, देवी जी की ...................... जय !


“प्रवीन बहल खुशदिल”

गरीबों की शिक्षा पर भ्रष्टाचार का डाका - स्कूलों में EWS कैटेगिरी में 3 से 10 लाख रिश्वत (NBT)

एक समय था जब अच्छी शिक्षा के साथ साथ हर विद्या में निपुण होने के लिए बच्चे को गुरुकुल भेजा जाता था ! जहाँ गुरु और शिष्य का एक अलग ही रिश्ता था ! जहाँ गुरु अपने प्रिय शिष्य के लिए रात दिन एक कर देता था तो वहीँ शिष्य अपने गुरु के लिए अपनी जान दांव पर लगाने में जरा सा भी संकोच नहीं करता था ! एकलव्य की कहानी इसका सार्थक उदाहरण हे !

बाद में गुरुकुल का रूप बदलकर पाठशाला हो गया ! जहाँ बच्चों के साथ जाति, धर्म का भेदभाव किया जाने लगा ! शिक्षा का स्तर गिरता चला गया ! किन्तु ऐसे वातावरण में भी कई विद्यार्थी अपनी बुद्धि व परिश्रम के बल पे आगे बड़े और ख्याति प्राप्त की ! महात्मा गाँधी, विवेकानंद जी, रविंदर नाथ टैगोर व भीमराव आंबेडकर को भला कोन भूल सकता हैं जिन्होंने देश में शिक्षा का अभाव होने के बावजूद विदेशों में शिक्षा प्राप्त करके नए कीर्तिमान स्थापित किये !

आज शिक्षा का स्तर कहाँ है ?

पाठशालाओं ने आज भव्य स्कूलों का रूप ले लिया हैं यदि कुछ संगठनों के द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों को छोड़ दिया जाये तो सुविधाओं के नाम पर खुलेआम लूटा जाता हैं! नाम अलग-अलग हैं - एडमिशन चार्ज, डोनेशन, डेवलपमेंट चार्ज ! उसके अलावा किताबें वा यूनिफार्म स्कूल से लेना अनिवार्य कर दिया जाता है जिनका मूल्य आसमान को छूता है ! उसमें स्कूलों का कमीशन शामिल होता है ! चार्ज इतने ठोक दिए जाते हैं और सुविधाएँ नदारद !

ऐसा नहीं है की सरकार की तरफ से कोई स्कीम्स नहीं हैं ! लगभग 25 प्रतिशत सीट्स गरीब वा जातिगत आधार पर सुरक्षित रखी जाति हैं ! जिसमें बच्चों को बिलकुल मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है ! किन्तु वहां भी रिश्वत का बोलबाला है ! पैसा फैंको तमाशा देखो ! आज की नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार ई.डब्लू.एस. में एडमिशन के लिए 3 लाख से 10 लाख तक रिश्वत दी जाती है! इस सम्बन्ध में 4 लोगों को हिरासत में भी लिया गया है ! किन्तु क्या इतना भर काफी है ? यहाँ तो लगभग हर स्कूल में भ्रष्टाचारियों का वास है ! ये सब गरीबों का हक़ मारना व शिक्षा से वंचित रखने का एक बड़ा रैकेट चलाया जा रहा है ! केवल एक आय प्रमाण पत्र देना होता है वो भी थोड़ी सी रिश्वत देके बनवा लिया जाता है !

मै दावे के साथ कह सकता हूँ की यदि उस स्कीम के अंतर्गत यदि सभी स्कूल्स की तहकीकात की जाय तो लगभग 80% लोग ऐसे निकलेंगे जिनकी आय उस सीमा से अधिक होगी और लगभग 40% तो ऐसे होंगे जिनकी आय एक लाख रूपए महीने से अधिक होगी ! लग्सरी गाड़ियों में घुमते होंगे ! बड़े बड़े मकान होंगे उनके पास ! दोस्तों वह लोग गरीबों से विश्वासघात कर रहे हैं ! किसी का हक़ मारकर वो क्या अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देंगे जबकि वो खुद भ्रष्टाचार में डूबे हैं !

और इन सबसे उपर एक बात और है ! आज सभी बड़े बड़े प्राइवेट स्कूल्स ने लॉबी बना ली है जिसके अंतर्गत उन्हें राजनैतिक सरंक्षण प्राप्त होता है ! आज आप स्कूल के नाम के साथ यह जरुर जुड़ा हुआ पाओगे की फलाना स्कूल फलानी पार्टी से जुड़ा है या उसे फलानी पार्टी का सरंक्षण प्राप्त है ! बड़े बड़े नेता इस गोरख धंधे में शामिल हैं ! पैसे लेकर बड़े से बड़े स्कूलों में एडमिशन करना आज आम बात है केवल स्टेटस देखा जाता है ! और यदि कोई स्कूल नियमों का पालन करके चलने की कोशिश करता भी है तो राजनीति से प्रेरित लोग नेताओं से धमकियाँ व प्रेशर डलवा कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं !

कभी शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल आज केवल भ्रष्टाचार और लूट का अड्डा बनते जा रहे हैं ! और यदि शिक्षा पर केवल अमीरों का ही अधिकार है तो गरीबों के लिए स्कीमें निकालने की ओप्चारिक्तायें क्यों ? क्या किसी गरीब को कोई हक़ नहीं की वो अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजिनियर, मेनेजर बनाने का ख्वाब संजोये ?

कभी तो वो दिन आएगा जब सबको सामान शिक्षा का अधिकार मिलेगा ! कभी तो वो दिन आएगा जब एक रिक्शा वाला कहेगा की मेरा बता डॉक्टर बन गया ! कभी तो वो दिन आएगा जब एक मजदूर की बेटी कहेगी मै वकील बन गयी !

पर कब ? कब होगा ये सब ? शायद ही कभी !


"प्रवीन बहल खुशदिल”


Thursday, 11 June 2015

....नगरी भ्रष्टाचार की....

दो मंजिल मकान पर तीसरी मंजिल बनवा रहे थे शुक्ला जी । शाम होते होते बहुत थक चुके थे । रात को ही पुरे परिवार के साथ "नायक" फ़िल्म देखी । इतने प्रभावित हुए नायक की भूमिका देखकर की प्रण कर लिया के आज से कभी ना रिश्वत लेंगे ना देंगे । आखिर हर नागरिक का देश के प्रति भी कुछ फ़र्ज़ बनता है ।
 
सुबह सुबह नो बजे बिजली का बिल ठीक करवाने विभाग के दफ्तर पहुंचे । बिना बात बारह हज़ार का बिल भेज दिया था एक महीने का जबकि चार या पांच सौ से ज्यादा का नहीं आता था हर महीने । ये आधा किलोमीटर लंबी लाइन लगी थी। एक तो इतनी गर्मी ऊपर से इतनी लंबी लाइन । खीजते हुए लाइन में लग गए साहेब ।

ये क्या । नंबर आया तो टी-टाइम हो चुका था । गर्मी में खड़े खड़े जल रहे थे सब लोग। बस धुआं निकलना ही बाकी था। अरे - साहिब गलती से इतना बिल भेज दिया - शुक्ला जी बोले। घूर के खा जाने वाली नज़रों से देखते हुए चिल्ला के बोला कर्मचारी - ये तुम हमें सिखाओगे की क्या गलत भेजा क्या सही। और लाइन से बाहर कर दिया ।

जी तो किया मुहँ तोड़ दें उसका। पर कर ही क्या सकते थे ? कई जगह चक्कर काटने के बाद किसी तरह तीन हज़ार कम हुए उसपर भी अंदर के एक व्यक्ति ने हज़ार रुपये रिश्वत मांग ली। अब मरता क्या ना करता हज़ार रुपये दे ही रहा था उसे की। हाय री किस्मत । एक पुलिस वाले ने देख लिया पैसे देते। अब काटो तो खून नहीं । हड़काते हुए हाथ पकड़ के खींचता हुआ बोला - चल थाणे । रिश्वत दे रो है म्हारे सामणे । किसी तरह हज़ार रुपये देकर हाथ जोड़कर पीछा छुट्वाया ।

आज पता नहीं किसका मुंह देखा था सुबह सुबह । अभी घर जाने के लिए स्कूटर पर बैठकर रेड लाइट क्रॉस कर ही रहे थे की ट्रैफिक वाले ने भी हाथ दे ही दिया । लाइसेंस - कागज दिखा । अब कुछ हो तो दिखाएँ। गाडी बंद होगी रे। बस स्तिथि सँभालते हुए साइड ले गए। पुरे पांच सो में मामला पटा । सोचा लगे हाथ पोलुशन भी चेक करा लें और लाइसेंस भी बनवा लें। पचास, तीन सौ। ये कोई गाड़ी का नंबर नहीं बल्कि पचास की रिश्वत पोलुशन वाले ने और तीन सौ लाइसेंस वाले को दी । फीस अलग ।

जैसे तैसे घर पहुंचे तो पता चला इनकम टैक्स का नोटिस आया है। अकाउंटेंट को फोन किया की इनकम टैक्स नहीं भरा क्या अब तक ? बोला वो तो भर दिया उसी का तो चेक दिया था आपने छेह हज़ार और पांच सो कैश। अब कैश क्यों - ये तो आप समझ ही गए होंगे । तभी उसे ध्यान आया - बोला ध्यान से देखो । सर्विस या सेल्स टैक्स का होगा । मैंने भी बिना पेपर पड़े बोला - आजा भाई चेक और कैश लेने ।

पर आज तो जैसे शुक्ला जी पर कोई श्राप का ही असर था। डेवलपमेंट अथॉरिटी वाले घर आ धमके । रे ना तू नक्शा पास कराके मकान बना रिया और न हाउस टैक्स दिया पिछले साल का । मकान टूटेगा थारा ।

मरता क्या ना करता । 25000 रुपये देकर जान छुटी । अब तक फ़िल्म का नायक बनने का विचार धूमिल हो चूका था । फ़िल्म सिर्फ फ़िल्म ही होती है । बोले - कुछ नहीं हो सकता इस देश का । जहाँ नीचे से लेकर ऊपर तक। दायें से लेकर बाएं तक। आगे से लेकर पीछे तक सब भ्रष्टाचारी हैं। वहाँ केवल एक ही जगह है जहाँ भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है । प्रभु की शरण !

मन ही मन शुक्ला जी शुक्र मना रहे थे उपरवाले का की आज उनका सामना किसी वकील या अस्पताल से नहीं पड़ा अन्यथा एक मंजिल बनाने की जगह एक मंजिल बेचनी पड़ती ।


"प्रवीन बहल खुशदिल"

(इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं व वास्तविक जीवन से इसका कुछ लेना-देना नहीं है)

....पार्किंग कूड़े की....

 लाहोल विला कुव्वत, कम्बख्त कोन सुबह सुबह गधे की तरह रंभा रिया हे ! अरे, बेगम सुनती हो ! अशफाक मियाँ ने अलसाते और खीजते हुए जोर से आवाज़ लगाई !

तभी उनकी बेगम सायेरा दनदनाती हुई आईं ! उनके हाथ में झाड़ू थी ! हां कहिये मियाँ - क्या बात हे ?

अरे ये वक़्त बेवक्त कोन हे जो जोर जोर से चिल्ला रिया हे – अशफाक मियाँ ने पूछा ?

बेगम बोलीं - अरे वो दो घर छोड़कर जो वर्मा जी नहीं रहते उनकी बेगम की पड़ोस वाले मास्टर जी की बीवी से कूड़े को लेकर लड़ाई हो रही हे !

अशफाक मियाँ बोले - कैसे जाहिल लोग हैं – कूड़े को लेकर लड़ाई ? कैसा मोहल्ला हैं ? जरा सी बात पर लड़ाई ! अनायास ही कुछ याद आते ही अशफाक मियाँ फिर बोले ! हाँ - कल भी अखबार में आया था जोरबाग में कूड़े के झगडे को लेकर मर्डर हो गया !

बेगम स्तब्ध ! या अल्लाह – मर्डर !

लेक्चर देते हुए अशफाक मियाँ बोले - छोटी सी बात पर लड़ाई ! अरे साफ़ सफाई रखो हमारी तरह ! एक कूड़े वाला नहीं लगा सकते ?

तभी अंदर से अशफाक मियाँ के आठ साल के साहिबजादे बिस्कुट खाते हुए आये और बचा हुआ आखिरी बिस्कुट खाते ही झट से बचा हुआ कागज दूसरी मंजिल की खिड़की से नीचे फैंक दिया ! अब अशफाक मियाँ कभी बेगम को देखें तो कभी खिड़की को ! डर ये की कहीं पडोसी न आ जाये लड़ने ! इसी पशोपेश में थे मियाँ, कि तभी घर की घंटी बज गयी ! अब तो अशफाक मियाँ का रंग फ़क ! ये क्या किया शहजादे ? अनायास ही डर और टेंशन की लकीरों के बादल छा गए !

तभी जोर की आवाज आई ! अरी सायेरा – जरा अपने शोहर से कह दे हमारे दरवाजे से गाड़ी हटा ले ! कितनी बार कहा - कि हमारे घर के बाहर गाडी खड़ी न किया करें ! अपने आप को सँभालते हुए अशफाक मियाँ ने जोर से कहा – हटाते हैं ! कल ऑफिस से लेट हो गए थे किसी ने हमारे घर के सामने अपनी गाड़ी खड़ी कर दी थी ! तो हमने आपके यहाँ अपनी गाड़ी लगा दी ! पलटकर जवाब आया – अरे कल को घर में कूड़ा फैंकने की जगह नहीं होगी तो क्या हमारे यहाँ फेंकोगे ?

ये कैसा जवाब ? अशफाक मियाँ को गुस्सा तो बहुत आया – पर मर्डर वाली बात याद आते ही उनकी हवाइयां उड़ने लगीं ! वैसे भी वो अभी मरना नहीं चाहते थे ? उम्र ही क्या हैं - पैंतीस ? और फिर कूड़े के लिए कोन और क्यों मरे ?

इतवार के दिन भी चैन नहीं लेने देते ! किसी तरह गिरते पड़ते अशफाक मियाँ उठे और गाड़ी जैसे ही वहां से हटाई ! तूफ़ान मच गया ! अरे ये क्या – कोई गाडी के नीचे इतना सारा कूड़ा फैंक गया ! भाई साहिब – इसे हटाइए ! अभी के अभी इसे हटाइए ! वरना कहे देती हूँ ! अजी सुनते हो ! अरे ये आप क्या कर रही हैं ? भाई साहिब को क्यों कहती हैं हम हटाते हैं ! मरता क्या ना करता !

कभी पानी का गिलास ना उठाने वाले अशफाक मियाँ आज खुलेआम सड़क से कूड़ा उठा रहे थे ! वाह रि किस्मत ! ये दिन देखना रह गया था !

गुस्से में दनदनाते हुए अशफाक मियाँ बेगम से अभी आने की बात कहकर गाड़ी लेकर चल दिए ! मुंह से बढ़बढाये जा रहे थे ! आज – आज बदल ही डालूँगा ये घर ! किसी अच्छे मोहल्ले में जायेंगे ! यही सोचते सोचते जाने कब उनके दोस्त सलीम का घर आ गया ! सलीम का दबदबा बहुत था उसके इलाके में ! फ़ोन से उसे इत्तेला दी कि तुम्हारे घर के नीचे खड़े हैं !

अरे ! अशफाक मियाँ ! इतनी सुबह ? सब खैरियत तो हैं?

बताता हूँ ! बताता हूँ ! पहले अंदर तो ले चलो ! अशफाक मियाँ की आवाज़ में गुस्सा और चिडचिडापन दोनों था !

हाँ ! अब बताओ ! क्या बताएं सलीम मियाँ– और अशफाक ने सारी आपबीती सलीम को बता दी !

हम्म ! तो ये माजरा हैं ! इतने में चाय भी आ गयी ! लो चाय पियो !

अरे नहीं हमें चाय नहीं ! फ्लैट चाहिए !

हाँ हाँ – फ्लैट भी मिलेगा ! पहले चाय तो लो ! सलीम मियाँ ने कहा !

अशफाक मियाँ ने जल्दी से चाये का कप उठाया ! इतनी तेजी से चाये पी रहे थे की जैसे अभी पाँच मिनट में फ्लैट खरीद डालेंगे ! तभी फ्लैट की बेल बजी ! किसी ने दरवाजा खोला और एक हट्टे कट्टे व्यक्ति ने अंदर कदम रखते ही सख्त लहजे में बोलना शुरू कर दिया - अरे सलीम मियाँ आपसे कितनी बार कहा हैं पार्किंग से गाड़ी निकलने की जगह तो छोड़ दिया करो ! आपके यहाँ कोई आया हैं और गाडी आढी टेढ़ी कड़ी कर दी ! कहते हुए वो गुस्से से बाहर चला गया !

अशफाक मियाँ हैरानी भरी नज़रों से सलीम की और ताक रहे थे ! सलीम के चेहरे पर अजीब सी मुस्कराहट थी ! अब हमें सारा माजरा समझ आ गया ! जब सलीम जैसे दबंग इंसान भी इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं तो अपनी क्या बिसात ! तभी सलीम मियाँ अशफाक की गाड़ी की चाबी टेबल से उठाते हुए खड़े हुए और बोले ! चलो चलते हैं मियाँ – तुम्हें फ्लैट दिखाने ! पर ऐसा फ्लैट – जहाँ पार्किंग, नाली और कूड़े की समस्या ना हो केवल एक जगह ही मिल सकता हैं अशफाक मियाँ ! अशफाक मियाँ ने उत्सुकतापूर्वक पूछा – कहाँ ?

चाँद पर ! सलीम ने कहा !

जोरदार ठहाकों के साथ सारा वातावरण गूँज गया !

बस इतनी सी थी ये कहानी – जिसमें हर गली, कूंचे में आपको कई अशफाक मियाँ मिल जायेंगे ! अब ये आपके उपर हैं की आप अपने आपको एडजस्ट करके समाज को सुधारने की कोशिश करेंगे या चाँद पर जायेंगे घर ढूँढने ?



“प्रवीन बहल खुशदिल”

Tuesday, 9 June 2015

मौत से पहले मौत

रिद्वार में गंगा जी के घाट पर रोज स्नान करना पाठक जी का नियम था। पूजा पाठ मे तीनों बहुत लीन रहते थे - पाठक जी उनकी जीवन संगिनी आशा व बीस वर्षीय इकलौता पुत्र वैभव । आजकल सिर फख्र से उठा के चलते थे पाठक जी। और हों भी क्यों ना - बेटा डॉक्टरी की पढ़ाई जो कर रहा था । लोग बड़े आदर से प्रणाम करके जाते थे उन्हें। पूरा हरिद्वार उनका और उनके बेटे का गुणगान कर रहा था। कोई पैसे का लालच नहीं। सिर्फ दूसरों की सेवाभाव के लिए ये प्रोफेशन चुना था वैभव ने। पिता के संस्कार कूट-कूट कर भरे थे उसमें।

अचानक मानो प्रलय आ गयी हो। कहर टूट पड़ा उस परिवार पर। सिर में चक्कर आने पर सभी टेस्ट की रिपोर्ट आई थी आज। माँ का कलेजा रो-रो कर मुंह को आ रहा था।

हह । भगवान् भी कैसी-कैसी परीक्षा लेता है। एक ऐसी बीमारी निकली वैभव को जिसका इलाज़ केवल दिल्ली के हॉस्पिटल में था । नोकरी से एक महीने की छुट्टी लेके पाठक जी वैभव को लेके अस्पताल आये। पर ये क्या ? बुरा हाल भीड़ से। सैंकड़ोंहज़ारों मरीज़ों की लंबी कतार । किसी तरह तीन दिन रुक के ऑपरेशन की तारीख मिली वो भी - एक वर्ष पश्चात।

आशा जी गुस्से से भरी पाठक जी को खरी-खोटी सुना रही थीं। कहा था ना। कहा था ना मुझे ले चलो साथ। मैं उनके आगे झोली फैलाकर भीख मांग लुंगी अपने बेटे की ज़िन्दगी के लिए। और फिर सारा दिन यही सब चलता रहा उस घर में। आखिर में तय हुआ की एक और कोशिश तीनो मिलके करेंगे। घर में ताला जड़कर निकल पड़े मन में भरोसा लिए तीनों।

आज पन्द्रहवां दिन था उनका। हॉस्पिटल के बाहर सड़क पर किसी तरह दिन गुजार रहे थे । जी हां। यही हाल था उस हॉस्पिटल का। दिल्ली के बाहर से आये लोग किसी जानवर की भांति सड़कों पर खुले आकाश में सोने को मजबूर थे ।

पाठक जी सोच रहे थे । क्या रुतबा है हमारा हरिद्वार में। और यहाँ यहाँ कुत्ते से भी बदतर जिंदगी बितानी पढ़ रही है। ऊपर से जब तब देखो एक चपरासी भी दुत्कार जाता है आके। फिर पैसे भी ख़त्म हो रहे थे उनके।

तभी उन्ही की तरह बाहर से आये किसी परिवार ने उन्हें बताया की दिल्ली के पास ही एक प्राइवेट हॉस्पिटल है। बहुत साफ़ सुथरा। बाहर की टॉप क्लास मशीनें है वहाँ । पर खर्च बहुत होगा। ये सब सुनकर उनके मन में आस जगी।

आशा जी ने तो मन ही मन निर्णय ले ही लिया था की घर बैच देंगे। हरिद्वार जाकर 65 लाख में मकान बेचकर वैभव को एडमिट करवाये आज 10 दिन हो चुके थे। आज उसका ऑपरेशन था।

कोई भी अंदर ना जा सकता था । अपने चिराग को देखने की बहुत तमन्ना थी आशा जी को । पुरे 6 घंटे चला ऑपरेशन । मजाल है जो पुरे वक़्त एक मिनट को भी हिली हों आशा जी। पुरे 6 घंटे प्रभु से वैभव की सलामती की दुआ मांगती रहीं।

आज चार दिन बीतने पर भी मिलने नहीं दे रहे थे वैभव से। वेन्टिलैटर पर है - बस यही जवाब था । 32 लाख रूपए लग चुके थे।

अचानक पांचवे दिन उनकी दुनिया उजड़ गयी। वैभव चल बसा । माँ बदहवास । पाठक जी - अवाक। सब खत्म ।

तभी वहां विजिलेंस का छापा पड़ा और पाया गया की न सिर्फ लोगों के अंग बैचे जा रहे थे बल्कि मृत्यु के बाद भी 5&5 दिन शव को वेंटीलेटर पर रखा जा रहा था।

पाठक जी मिडिया के सामने बोले चले जा रहे थे - सिर्फ पैसे के लिए । पैसे के लिए ये डॉक्टर आज भगवान् से शैतान बनते जा रहे हैं। अच्छा हुआ मेरा वैभव चला गया । वर्ना वो भी शायद ऐसा दानव ही बनता। है प्रभु - तू इतना निर्मम कैसे हो सकता है।

तभी उनकी नज़र चरों तरफ गयी। चीख पुकार मची हुई थी। सैंकड़ों वैभव उस हॉस्पिटल की भेंट चढ़ गए थे। आज कुछ डॉक्टर्स के लालच की वजह से पूरा प्रोफेशन कलंकित हो चुका था।

एकांत में जाकर आँखे मूंदकर पाठक जी पूछ रहे थे उपरवाले से - है प्रभु । क्या इस रात की कभी सुबह होगी क्या इस अत्याचार से कभी मुक्ति मिलेगी ? आज से आप भी मेरा साथ दीजिये और मैं प्रण करता हूँ मैं और आशा लड़ते रहेंगे इन भेड़ियों से तब तक :-

जब तक है जान। जब तक है जान। जब तक है जान।

"प्रवीन बहल खुशदिल"


Sunday, 7 June 2015

....वृद्धावस्था - एक अभिशाप....

क़्त का प्रवाह रोके नहीं रुकता । समय किसी की जागीर नहीं जिसे अपनी तिजोरी में संजो के रख लिया जाये । वो तो एक आजाद पंछी की भांति स्वतंत्र है। स्वछन्द आकाश में एक सामान गति से उड़ता एक आजाद पंछी।

क्या रौब, क्या शानोशौकत, क्या रुतबा । इज़्ज़त से झुककर सलाम ठोक के जाते थे आने जाने वाले त्रिपाठी जी को। बनारस की जानी मानी हस्ती थे। वो भी हर व्यक्ति की मदद किया करते थे। कोई खाली हाथ न जाता था उस हवेली से। भरपूर साथ मिलता था त्रिपाठी जी को उनकी अर्धांगिनी रागिनी जी से । तीन बच्चों के माता पिता अपने को दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान महसूस करते थे।

किन्तु यह क्या ? आज केवल तीस वर्षों उपरान्त स्तिथि इतनी भयावह थी। मानो कोई सपना मात्र था । आँखों में चश्मा, झुकी कमर, सफ़ेद बाल, कमजोर व जर्जर होता शारीर एक लाठी के सहारे किसी तरह् अपने आपको खींचता एक बुजुर्ग वृद्धाश्रम के एक कोने में जाकर बैठ गया। मैं उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था । काफी जोर देने के उपरान्त जैसे ही मैनें उसे पहचाना अनायास ही मुंह से निकल गया - त्रिपाठी जी आ आ आप ! यकीं नहीं कर पा रहा था। फिर भी अपने जज्बात छुपाते हुए मैंने अपने आप को संभाला और पूछा। यहाँ कैसे? मेरी तरफ पहचानने वाली नज़रो से देखते हुए उस बुजुर्ग की आँखे छलक आयीं।

सारा माज़रा समझ आते मुझे देर ना लगी क्योंकि आज ऐसा वक़्त आ चुका है जहाँ हर गली कूचे में आपको कई त्रिपाठी जी मिल जायेंगे जो या तो वृद्धाश्रम पहुंचा दिए गए या पहुंचाए जा रहे हैं।

कोई रहम नहीं अपने पिता के लिए। कोई दया नहीं अपनी जननी अपनी माँ के लिए। ना समय है आज के बच्चों के पास ना उन्हें देने के लिए पैसा। अरे कम्बख्तों ! जरा आत्ममंथन करो। कैसे तुम्हारे वालीदेन ने तुम्हारी परवरिश की। रात रात भर जाग कर तुम्हारे दुखों को अपने ऊपर लिया । हर ख्वाहिश सर आँखों पर ली और उसे पूरा किया । और आज। आज तुम्हारे पास उनके लिए ना पैसा है ना समय। है तो सिर्फ ताने, गालियां , दुत्कार। उफ्फ्फ! ये वक़्त देखने से पहले मेरा सीना फट क्यों न गया ।

भरे पड़े हैं आज वृद्धाश्रम बुजुर्गों से। उनकी तरसती निगाहें गाहे-बगाहे किसी का इंतज़ार करती है की शायद उनसे मिलने कोई अपना आ जाये। उन्हें पैसा नहीं चाहिए । उन्हें चाहिए हमदर्दी, अपनापन। हर बुजुर्ग की आँखे आंसुओं में डूबी किसी को तलाशती दिखाई देंगी आपको। किन्तु हज़ारों में शायद ही कोई विरला किस्मत वाला होता होगा जो अनजान और बेनाम मौत के आगोश में ना जाए।

भागदौड़ चकाचोंध की दुनियां में आज बच्चे ये सोचने की जेहमत उठानी भी गंवारा नहीं करते की वो भी कभी बुजुर्ग होंगे। उनपर भी कभी ये पहाड़ टूटेगा। वक़्त कभी भी एक सा नहीं रहता। वो तो चलता रहता है अपनी रफ़्तार से।

खाली समय शुन्य की गहराईयों में झांकते हुए पूछता हूँ अपने आप से, पूछता हूँ उपरवाले से - कब तक आखिर कब तक झेलनी होगी ये मौत से बदतर जिंदगी इंसान को ।

और यदि इसका कोई उपाय है ही नहीं - तो बुढ़ापे से पहले की मौत ही अच्छी इंसान को। वही दे दे प्रभु! वही दे दे!

"प्रवीन बहल खुशदिल"